Arjun The Warrior Within | अर्जुन की अंतर्यात्रा
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“कुरुक्षेत्र केवल एक युद्धभूमि नहीं था।
वह एक मनुष्य के भीतर चल रहा संघर्ष था।”
अधिकांश लोग श्रीमद्भगवद्गीता को श्लोकों, उनके अनुवादों और
दार्शनिक व्याख्याओं के माध्यम से जानते हैं।
वे उसे पढ़ते हैं।
उसकी प्रशंसा करते हैं।
उसके विचारों को महान मानते हैं।
फिर भी, एक प्रश्न अक्सर अधूरा रह जाता है—
“ आख़िर अर्जुन के भीतर ऐसा क्या बदला कि वही व्यक्ति, जिसने अपना गांडीव रख दिया था,
कुछ समय बाद उसी युद्धभूमि में अडिग होकर खड़ा हो गया? ”
इसी प्रश्न ने इस पुस्तक को जन्म दिया।
यह पुस्तक श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण से नहीं लिखी गई है।
“ यह अर्जुन की दृष्टि से लिखी गई है।
अर्जुन ने वह प्रश्न पूछा ही क्यों। ”
उसके भीतर ऐसा कौन-सा भय था, कौन-सा मोह था,
कौन-सी पीड़ा थी जिसने उसे भीतर से तोड़ दिया। ”
क्योंकि जब तक प्रश्न की जड़ समझ में नहीं आती, उत्तर केवल शब्द बनकर रह जाते हैं।
यह पुस्तक गीता का भाष्य नहीं है।
यह श्लोकों का अनुवाद भी नहीं है।
यह अर्जुन की एक जीवंत अंतर्यात्रा है।
एक ऐसी यात्रा जिसमें हम उसके साथ चलेंगे—उसकी उलझनों में, उसके मौन में, उसके टूटने में,
उसके प्रश्नों में, उसके स्वीकार में और अंततः उसके रूपांतरण में।
From Confusion → Clarity
From Fear → Courage
From Collapse → Awakening
लेखित एवं रूपांतरित
मयंक गुप्ता | ब्रांडहिंदू
“मैंने केवल अंतर्यात्रा नहीं पढ़ी।
मैं अर्जुन के साथ चला।
और कहीं न कहीं…
मैं भी बदल गया।”
| Weight | .5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 25 × 15 × 3 cm |
| Language | HINDI, ENGLISH |
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